अपना रख पराया चख |
अपनी वस्तु की रक्षा, दूसरी की वस्तु का उपभोग |
अकेला चना भाड नहीं फोड़ता |
कोई बड़ा कार्य एक आदमी के वंश की बात नहीं। |
अंत भले का भूला |
अच्छे कार्य का परिणाम भी अच्छा होता है। |
अटका बनिया दे उधार |
अपनी गरज पर दबाना पड़ता है। |
आधा तीर आधा बटेर |
अनमेल मिश्रण |
आधी छोड़ पूरी को धाबे आधी मिले न पूरी पावे |
लालच छोडे़ थोडे़ में ही संतोष करना चाहिए। लालची को कुछ भी नहीं मिलता। |
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे |
स्वयं दोषी होकर निर्दोष को दोषी ठहरा। |
उंगली पकड़ कर पोछा पकड़ना |
थोड़ा सहारा बाद में उस पर अपना दावा जमाना |
ऊँची दुकान फीका पकवान |
केवल बाहरी चमक दमक, भीतर खोखलापन |
कूद-कूद मछली बगुले को खाये |
विपरीत कार्य होना |
क्या काबुल में गधे नहीं होते हैं |
अच्छे स्थान पर बुरे लोग भी होते हैं। |
कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर |
एक दूसरे की सहायता लेने ही पड़ती है। |
कही की ईट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा |
असंगत वस्तुआंेे का मेल बैठाना |
घर का भेदी लंका ढाए |
आपसी वैमनस्य से बड़ी हानि होती है। |
घर की मुर्गी दाल बराबर |
हरतगंत बीज का विशेष मूल्य नहीं होता |
घी का लड्डू टेठा तला |
काम की वस्तु कुरूप होने पर भी ठीक समझी जाती है। |
घर मंे बीबी झोंके भाड़ बाहर मियां सूबेदार |
झूठी शान जताना |
चोर के पैर नहीं होते |
अपराधी स्वयं भयभीत रहता है। |
चाँदी देख चाँदना, सुख देखे व्यवहार |
धनाढ्य के सभी सगे होते है। |
चलती का नाम गाड़ी है। |
जैसे सफलता मिले उसी का यश फैले |
जंगल में मोर नाचा किसने देखा |
योग्यता एवं वैभव का ऐसे स्थान प्रदर्शन जहाँ उसकी कोई कद्र न हो। |
जैसा देश वैसा भेष |
जहां रहो, वहां वैसी रीति पर चले |
देहरी लांघते पाप लगना |
अतिशीघ्र बदनामी होना |
दूसरी की पत्तल लम्बा-लम्बा भात |
पराई वस्तु सदा अच्छी लगती है। |
नंगे खड़े मैदान में चोर बलैया लेय |
जिसकी क्षति होने का भय नहीं है, उसकी रक्षा करना व्यर्थ हैं |
नाई की बारात में सब ठाकुर |
स्वंय को सबसे बड़ा मानने वाले लोगों का समूह |
निबल की जोरू सबकी भोजाई |
कमजोर को सब दबाते हैं। |
नौ की लकड़ी नब्बे खर्च |
मूल्य से अधिक वस्तु की देखरेख में व्यय |
न रहेगा बाँस न रहेगी बाँसुरी |
किसी बात के कारण चीज को ही जड़ से ही मिटा देना। |
नौ नगद न तेरह उधार |
उधार से नगद थोड़ा मिलना ही अच्छा है। |
नाच न जाने आंगन टेड़ा |
अपनी अकुशलता का दोष दूसरों पर ढालना। |
बांह गहे की लाज |
शरण में आने वाले की रक्षा |
बिल्ली के गले में घंटी |
कठिन कार्य सम्पन्न करना। |
बिन मागें मोती मिले मांगे मिले न भीख |
मांगन अच्छा नहीं होता। |
भुस में आग लगाकर जमालों दूर खड़ी |
कलह का बीज बो कर तटस्थ रहना |
मियां जी दाढ़ी, तांबी जो मंे गाड़ी |
किसी वस्तु का दूसरे में समाप्त हो जाना। |
मुंह में राम बगल में छुरी |
‘कपट व्यवहार’ |
राम की माया कहीं धू कहीं छाया |
ईश्वर की इच्छानुसा मुख दुःख सभी जगह है। |
रस्सी जल गली पर बल नहीं गया |
बर्बाद होने पर भी अहंकार बना रहना |
लेने एक न देना दो |
किसी से कोई मतलब नहीं |
वहीं ढाक के तीन पात |
स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं |
सस्ता रोय बार बार मंहगा रोये एक बार |
सस्ती वस्तु खरीद कर प्रतिदिन परेशान हाना पड़ता है। |
सेवा करें सो मेवा पावै |
सेवा का फल सदा अच्छा होता है। |
हीरे की परख जौहरी जानेे |
गुणवान ही गुणों की पहचान करता है। |
हमारी दिल्ली और हमी से म्याऊँ |
जिस पर आश्रित होना उसी पर रौब जमाना |
कहाँ राजा भोज कहां गंगु तेली |
आकाश पाताल का अंतर |
आम के आम गुठलियांे के दाम |
दोहरा लाभ |
घर आए नाम नू पूजिए बामी पूजन जाए |
अवसर का लाभ न उठाना और बाद में उसके लिए परेशान सहना |
राम नाम अपना, पराया माल अपना |
धोखे से धन जमा करना |
सावन हरे न भादों सूखे |
सदा एक समान रहना |
फिसल पड़े तो हरे गंगा |
मजबूरी में काम करना |
दोनों हाथों में लड्डु |
सब ओर लाभ ही लाभ होना |
एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी |
अपराधी होकर उल्टे अकड दिखना |
काठ की हांडी बार-बार नहीं बढ़ती |
छल कपट का व्यवहार हमेशा नहीं चलता |
कोई ईर घाट कोई बीर घाट |
ताल मेल न होना |
हाथी के पाँव सबका पाँव |
बड़े आदमी की हाँ में हाँ मिलाना। |
जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजे |
समय का रूख देखकर काम करना |
अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता |
स्वयं प्रयत्न करने पर काम बनता है। |
जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ न पहुँचे कवि |
कवि के लिए कुछ भ्ी आगग्य नहीं है। |
फटे में टाँग अड़ाना |
दूसरे के झगड़े में घुसना |
आग लगन्ते झोंपड़ा जो निकले सो लाभ |
नुकसान होते होते जो कुछ बच जाए वही बहुत है। |
आ बैल मुझे मार |
जान बूझकर मुसीबत मंे पड़ना |
सब धान बाईस पसेरी |
अच्छा बुरा सबको एक समान समझना |
जैसी करनी वैसी भरनी |
कार्य के अनुसार परिणाम मिलता है। |
कोयले की दलाली में हाथ काला |
बुरी संगत से बदनामी मिलती है। |
चमड़ी जाये पर दमड़ी न जायें |
मर जाये पर पैसा न जाये |
अपनी करनी पार उतरनी |
कर्म का फल अवश्य मिलता है। |
तबेले की बला बन्दर के सिर |
किसी का अपराध दूसरे के सिर |
आगे कुआँ पीछे खाई |
सभी और से विपत्ति का आना |
नीम हकीम खतरे जान |
अल्प विधा भयंकर |
जर कार जोर पूरा है और सब अधूरा है |
धन में सब कार्य सिद्ध करने की शक्ति है। |
गुड़ खाये गुलगुलों से परहेज |
किसी व्यक्ति से प्यार करके उसके व्यवहार से घृणा |
तू डाल-डाल में पात-पात |
दोनों चालाक |
मान न मान में तेरा मेहमान |
जबरदस्ती गले पड़ना |
दूध का जला छाछ भी फँूक-फँूक कर पीता है। |
एक बार धोखा खाने वाला अधिक सावधान हो जाता है। |
एक एक ग्यारह होते हैं |
संगठन में शक्ति है |
अपना हाथ जगन्नाथ |
अपने हाथ से कार्य करना। |
अपनी डफली अपना राग |
सबका अपने अपने मन के अनुसार चलना |
जैसे नाग नाथ वैसे साँप नाथ |
सब एक समान दुष्ट प्रकृति वाले हैं। |
खरबूजे को देखकर घरबूजा रंग बदलता है। |
पड़ोस का असर पड़ता है। |
आपु न जावै सासुरे औरन कूँ सिख देत |
स्वयं किसी कार्य को न करना और उसको करने के लिए दूसरों को उपदेश देना। |
सूप के फटके सूप नहीं रहते है। |
जहां की चीज होती है वहीं चली जाती है। |
आसमान से गिरा खजूर में अटका |
किसी काम के बनने में अनेक बाधाओं का उपस्थित हो जाना। |
दुविधा में दोनांे गये मोवा मिली ने राम |
अनिश्चय की स्थिति में व्यक्ति दोनों ओर से हानि उठाता हैं |
अब पछताये से होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत |
समय पर कार्य न करने से बाद में पछताना पड़ सकता है। |
हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होय |
बिना खर्च किये कार्य का अच्छा होना। |
आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास |
किसी कार्य विशेष की उपेक्षा कर किसी अन्य कार्य में लग जाना |
एक म्यान मंे दो तलवार |
सबल प्रतिद्वन्ति एक साथ नहीं रह सकते। |
तीन लोक से मथुरा न्यारी |
सबसे अलग विचार करना |
हाँसिये के ब्याह में खुरपी का गीत |
असंगत बातें करना |
अन्धा बांटे रेवड़ी चीन-चीन के दे |
न्याय के ओर से आँख मूंदकर स्वजनों को लाभ पहुँचाना |
भौर न छाड़े केतकी तीखे कंटक जान |
अनेक पेरशानी आने पर भी प्रेमी प्रेम नहीं छोड़ते |
कुम्हार अपना ही घड़ा सराहता है। |
अपनी बनायी हुई वस्तु सभी को अच्छी लगती है। |
दस जने की लाठी एक जने का बोझ |
सहयोग से काम आसानी से हो जाता है। |
सौ सयाने एक मत |
बुद्धिमानों के विचार एक से होते हैं |
खाईये मन भाता पहेनिये जग भाता |
निजी जीवन जैसी स्वतंत्रता सार्वजनिक जीवन में नहीं खोजनी चाहिए। |
बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद |
मूर्ख व्यक्ति गुण की सही परख नहीं कर सकता। |
पत्थर को जांेक नहीं लगती है |
सबल का शोषण नहीं होता |
ऊँट दूल्हा पुरोहित गधा |
एक मूर्ख व्यक्ति द्वारा दूसरे मूर्ख की प्रशंसा करना |
काला अक्षर भैंस बराबर |
अनपढ़ होना |
अरहर की टट्टी गुजराती ताना |
अनमोल साधन जुटाना |
कमावै धोती वाला उड़ावै टोपी वाला |
परिश्रमी लोग कमाते है, और शोकीन उसे उड़ाते हैं |
जाके पाँव न फटे बिवाई सो क्या जाने पी पराई |
जिसके ऊपर बीतती है वही जानता है। |
अन्धेर नगरी वेबूझ राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा |
न्याय विहीन शासन |
एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा |
एक बुराई पर दूसरी बुराई |
डूबते को तिनके का सहारा |
आपत्ति के समय थोड़ी सहायता भी बड़ी होती है। |
काम का न काज का दुश्मन अनाज का |
दूसरों पर बोझ बनकर रहने वाला व्यक्ति |
तन पर नहीं लत्ता पान खाये अलबत्ता |
झूठ बोलाना, शेखी मारना |
कोयले की दलाली में मुँह काला करना |
बुरी संगत मंे कलंक लगना |
एक हाथ से ताली नहीं बजती है। |
एक ओर से झगडा कभी नहीं हो सकता |
बिल्ली को पहले दिन ही मार देना चाहिए। |
भय का समन शुरू में ही कर लेना चाहिए। |
अपना माल खोट तो परखैया का क्या दोष |
यदि स्वयं ही दोषी है तो बुर बताने वाले का क्या दोष |
न नौ मन तेरा होगा न राधा नाचेगी |
कार्य करने के लिए कोई असाधारण शर्त रख देना। |
आदमी जाने वसे, सौना जानै कत्तै |
साथ रहने पर ही किसी व्यक्ति का मूल्यांकन किया जा सकता है। |
बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा |
वस्तु के पास रहने पर भी उसे चारो ओर ढूंढना |
कागज की नाम अधिक समय तक नहीं चलती |
ऊपरी दिखावा दिखाने वालों की जल्द ही पौल खुल जाती है। |
चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात |
थोडे़ दिनों का सुख |
नौ सौ चूहे खाये बिलारी बैठी तपको |
अनेक पाप करके धर्म की बात करना। |
उतर गयी लोई तो क्या करके कोई |
बेशर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता |
अन्धा पावै आँखे तो पतियाये |
अभिष्ट की प्राप्ति होने पर विश्वास का जमना |
हाथ कंगन को आरसी क्या |
प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं |
गुरू गुड चेला चीनी |
गुरू से चेले का आगे बढ़ जाना |
अशर्फियां लुटे और कोयले पर छाप |
मूल्यावाल वस्तुआंे की ओर ध्यान न देकर व्यर्थ की चीजांे की फिक्र करना। |
ऊँट मक्का की ओर भागता है। |
अपनी जन्म भूमि को सब प्रेम करते है। |
यह मूँह और मसूर की दाल |
हैसियत से बढकर चाहना |
खग जाने खग ही की भाषा |
चालाक ही चालाक की बात समझता है। |
ऊधौ का लेना न मांधौ का देना |
अपने काम से काम |
आप मियाँ जी मांगते द्वार खड़े दरवेश |
किसी निर्धन के घर भिखारियों की भीड़ होना |
आँख न दीदा काड़े कसीदा |
साधन न होने पर भी काम कर लेना। |
हाथ सुमरनी बगल कतरनी |
कपटपूर्ण व्यवहार |
अन्धे के आगे रोबे अपने नैना खोवे |
जो अपने दुख के को न समझे उसके आगे दुखड़ा रोने से कोई लाभ नहीं होगा। |
अपना घर दूसरे सूझता है। |
अपने मतलब की बात कोई नहीं रखता है। |
यथा राजा तथा प्रजा |
स्वामी के अनुसार ही सेवक भी होते है। |
घड़ी मंे तौला घड़ी मंे मासा |
जरा सी बात पर खुश होकर नाराज होना। |
आग लगने पर कुआँ खोदना |
विपत्ति आ जाने पर उसका निराकरण करना |
हाथी के दांत दिखाने और खाने |
दिखावा कुछ और असलियत कुछ और |
अंधे के हाथ वटेर लगना |
अपात्र को सफलता मिलना |
कखरी मंे लरका गाँव गोहार |
वस्तु के पास होने पर भी दूर-दूर तक उसकी तलाश करना |
नेकी और पूछ-पूछ |
अच्छे कार्य के लिये आज्ञा की क्या आवश्यकता |
तेली का तेल जले मसालची का दिल जले |
एक को खर्च कते देख दूसरा परेशान |
बोए पेड़ बबूल का आम कहां से होए |
बुरे काम का फल अच्छा नहीं हो सकता |
ऊँट को निगल लिया ओर दुम को हिचके |
बड़ी विपत्ति को स्वीकार करना और साधारण पर संकोच करना |
नई नईन बाॅस का नैहन्ना |
नये शोक को पूरा करने के लिए अजीम कार्य करना |
खेती पाती बीनती ओर घोडे़ की तंग, अपने हाथ संभालिये चाहे लाख लोग होये संग |
अपना कार्य स्वयं करो |
नेकी कर दरिया में डाल |
उपकार करके भूल जाना चाहिए |
हथेली पर सरसों नहीं जमती |
कोई कार्य झटपट नहीं हो सकता |
गधा खेत खाये जुलाहा पीटा जाये |
किसी के कर्म की सजा किसी और को मिले |
चोर-चोर मौसरे भाई |
एक पेशे वाले आपस में नाता जोड़ लेते हैं |
अन्धे को अन्धेर मंे बहुत दूर की सूझी |
मूर्ख ने बुद्धिमानी की बात की |
आम खाने या पेड़ गिनने |
व्यर्थ की बातें करके केवल अपने मतलब की बात करना |
पर उपदेश कुशल बहुतेरे |
दूसरों को उपदेश देना आसान समझना |
दर्जी की सुई कभी ताश में कभी टाट में |
खाली न होना |
आँख का अन्धा गाँठ का पूरा |
मूर्ख किन्तु धनी |
खोदा पहाड़ निकली चुहिया |
अधिक परिश्रम किन्तु लाभ कम |
पढ़े फारसी बेचे तेल या देखो कुदरत का खेल |
विवश होकर योग्यता से निम्न स्तर का कार्य करना। |
पाव भर चून पुल पर रसोई |
सीमित साधन होने पर भी अधिक लोगों को निमंत्रित करना। |
कौआ भी हौंड न ले जायेगो |
दूर रहने वालों की कोई खबर नहीं होती |
तीन दिन महमान चैथे दिन हैवान |
अतिथि कुछ दिनों का ही अच्छा होता है। |
साँच को आँच नहीं |
सच्चे को डरने की आवश्यकता नहीं होती |
हाथी निकल गया दुम रह गयी |
सारा काम हो गया बस थोड़ा सा रह गया है। |
भागते भूत की लंगोटी भली |
जो मिल गया वही बहुत |
अन्त भले का भला |
अच्छे कार्य का परिणाम भी अच्छा होता है। |
प्रभुता पायी काहि मद नाहीं |
धन वैभव प्राप्त होने पर मनुष्य मंे घमण्ड आ जाता है। |
एक पथ दो काज |
एक काम से दोहरा लाभ |
आगे नाथ न पीछे पगहा |
किसी प्रकार का अंकुश न होना |
घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या |
अपना हक लेने में लिहाज न करना |
थका ऊँट सराय तकता है। |
दिन भर की महनत के बाद घर की याद आती है। |
अध जल गगरी छलकत जाये |
अल्पज्ञ द्वारा गर्व प्रदर्शन करना। |
जाको राखे साइयाँ मार सके न कोए |
जिसकी रक्षा ईश्वर करता है उसे कष्ट नहीं पहुँचा सकता है। |
कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता |
हठी मनुष्य किसी का कहना नहीं मानता है। |
आँख का अन्धा नाम नयन सुख |
गुण के विपरीत नाम |
मन के हारे हार है मन जीते जीत |
हतोत्साहित होन पर असफलता और निरन्तर उत्साह पूर्वक कार्य करने वासले को सफलता मिलती है। |
ऊँट के मुँह में जीरा |
जरूरत से बहुत कम |
घोडांे का घर कितनी दूर |
पुरूषार्थाी व्यक्ति को सफलता सरल होती है। |
पुचकारा कुत्त्ता सिर चढे |
ओछे लोग मुँह लगाने पर अनुचित लाभ उठाते हैं। |
अरध तजहि बुध सरबस जाता |
सब कुछ नष्ट हो रहा हो तो बुद्धिमान आधा छोड़ देते है। |
माने भीख पूछे गाँव की जतमा |
अपनी असलियत भूूलकर बात करना। |
घर फँूक तमाशा देखना |
शान के लिए औकात से बाहर व्यय करना |
एक तन्दुरस्ती हजार नियामत |
स्वास्थ्य बहुत बड़ी ची है। |
सिर सहला भेजा खाऐ |
दोस्त बनकर हानि पहुँचाना |
एक अनार सौ बीमार |
किसी वस्तु की पूर्ति कम किन्तु माँग अधिक होना। |
जल में रहकर मगरमच्छ से बैर |
आश्रयदाता को शत्रु नहीं मानना चाहिए। |
तेल देखो तेल की धार देखो |
रूख पहचानना |
गंगा गए गंगादास , जमुना गए जमुनादास |
जिसका कोई दृढ सिद्धान्त नहीं होता। |
नई घौंसन उपलों की तकिया |
अपने नए शौक को पूरा करने के लिए अनप्रेक्षित कार्य करना |
जो गरजते हैं वे बरसते नहीं |
केबल बड़ी-बड़ी बातें |
छछुन्दर के सिल में चमेली का तेल |
अयोग्य व्यक्ति को अच्छा पद मिलना |
अपने घर मंे दिया जलाके तक मस्जिद मंे जलाते हैं |
पहले अपना स्वार्थ पूरा करके तब परमार्थ किया जाता है। |
एक तबे रोटी क्या छोटी क्या मोटी |
सब लगभग एक समान होना |
चोर की दाढ़ी मंे तिनका |
अपराधी सदा शंका से घिरा रहता है। |
नई-नई मुसलमानी, अल्लाह ही अल्लाह पुकारे |
नवीन पद प्राप्त होने पर अपने को अधिक प्रदर्शित करना। |
अन्धी पीसे कुत्ता खाये |
असावधानी के अयोग्य को लाभ |
घर मंे नहीं दाने बीबी चली भुनाने |
सामथ्र्य से बाहर कार्य करना। |
आप डूबे तो जग डूबा |
बुरा आदमी सबको बुरा कहता है। |
अंधों में काना राजा |
अयोग्य व्यक्तिओं के बीच कम योग्य व्यक्ति भी आदर पाता है। |
सौ दिन चोर का एक दिन साहूकार का |
कई बार अपराध करके बच जायें पर एक पकड़े जाने पर पूरा दण्ड लि जाये |
अंधा क्या चाहे दो आँख |
अत्यावश्यक, वस्तु को प्राप्त करने की लालसा |
के हंसा माती चुगै के लंघन कर मर जाये |
बहुत स्वादिष्ट भोजन करने वाला व्यक्ति |
कोठी वाला रोवे छप्पर वाला सोवे |
अधिक धन दुःख का कारण है। |
मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन |
मुफ्त में मिली वस्तु का अपमान करना। |
आया है जो जायेगा क्या राजा क्या रंक |
मृत्यु रका प्रकृति का शासवत नियम है। |
बन्दर की आशनाई घर मंे आग लगाई। |
मूर्ख से मित्रता करने पर हानि होती है। |
कंगाली में आटा गीला होना |
मुसीबत पर और मुसीबत आना |
ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती |
आवश्यकता से कहीं न्यून वस्तु की प्राप्ति। |
ईतर के घर तीतर बाहर टांगे कि भीतर |
नई चीज लोगों को दिखाने की चाह |
खारी मजदूरी चोखा काम |
नगद और अच्छी मजदूरी से काम अच्छा होता है। |
मढे़ दमामा जात कहुँ चूहे के चाम |
छोटे लोगों से बड़ा काम नहीं होता |
एक मछली सारे तालाबा को गंदा करती है। |
एक बुरे व्यक्ति के कारण पूरी बिरादरी बदनाम होती है। |
कबीरा हाँड काठ की चढ़े न बारबार |
छल कपट का काम एक बार होता है। |
जिस पेड के तले बैठना उसी की जड़े काटना |
आश्रय देने वाले का विनाश करना। |
ठाली बनिया क्या करै, इस कोठी के धान उस कोठी में धरै |
बेकार आदमी व्यर्थ के काय्र्र करना है। |
धोवे सौ-सौ बार भी काजर होये न स्वेत |
बुरे व्यक्ति पर शिक्षा का कोई असर नहीं होता। |
साॅप छछुन्दर की सी गति होना |
दुविधा में पड़ना |
जादू वही जो सिर चढ़कर बोले |
उपाय वही अच्छा जो सफल हो और जिसे विरोधी भी माने |
एक चुप सौ को हराये |
मौन रहना अत्यंत हितकारी है। |
चोट्टी कुतिया जलेबी की रखवाली |
भक्षक को रक्षक का काम सौंपना |
जो तोको काॅटा वुबे ताहि बोय तू फूल |
बुराई का बदला भलाई से दो |
दाल-भात में मूसलचन्द्र |
आवश्यक दखल देना |
दुधारू गाय की लात भली |
जिससे लाभ की आशा हो उसकी झिडकियां भी भली |
भूखे भजन न होहिं गोपाला |
क्षुधा तृप्ति से हो कार्य झमता आती ह। |
मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक |
जिसका आना जाना सीमित क्षेत्र तक हो |
पानी पीकर जाति नहीं पूछी जाती। |
काम होने के बाद उसके बारे में खोजबीन करना व्यर्थ है। |
छोड़न का घर कितनी दूर |
व्यक्ति को छोटा काम भी बड़ी लगता है। |
पाँसा पड़े सो दाँव, रोजा करे सो न्याउ |
अधिकार की बात मान्य होती है। |
दलाल दीवाला, क्या मस्जिद का ताला क्या |
विशेष क्षति का भय न हो तो रक्षा की व्यवस्था व्यर्थ है। |
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा |
किसी की आँखों के आगे उसका सर्वस्व लुट जाना |
ओठों निकली कोठों चढ़ी |
मुँह से निकली बात गुप्त नहीं रहती |
अपनी नाक काटकर दूसरे का अपशकुन करना |
अपनी हानि करके दूसरे की हानि करना। |
होम करते हाथ जलना |
किसी अच्छे काम को करते हुए विपत्ति आ जाना। |
नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है। |
बड़ों के सामने छोटों की बात कोई नहीं सुनता। |
अपनी पगढ़ी अपने हाथ धोना |
व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा स्वयं बनाता है। |
चोरी का माल मोरी में |
हराम की कमाई व्यर्थ जाती है। |
उल्टेबाँस बरेली को |
विपरीत कार्य |
चाँद को भी ग्रहण लगता है। |
विपत्ति सभी पर आती है। |