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Saturday, 23 December 2017

What is Wi-Fi - वाई-फाई क्या है

वाई-फाई ( Wi-Fi) आधुनिक युग का डाटा और इंटरनेट शेयर करने का सबसे आसान और तेज तरीका है, लेकिन ये वाई-फाई ( Wi-Fi ) आखिर है क्‍या और किस तकनीक पर आधारित है आईये जानने की कोशिश करते हैं - वाई-फाई क्या है (Kya Hai Wi-Fi) -

वाई-फाई क्या है - What is Wi-Fi



वाई-फाई ( Wi-Fi) की पूरा नाम (full form) वायरलेस फिडेलिटी (Wireless fidelity) है, वाई-फाई ( Wi-Fi) आविष्‍कार John O'Sullivan और John Deane ने सन् 1991 में किया था। असल में यह एक वायरलैस नेटवर्किंग सुविधा है, जिसे आप (WLAN) यानि Wireless Local Area Network के नाम से जानते हैं, जिसकी सहायता से आप बडी आसानी से मोबाइल, लैपटॉप, कंम्‍प्‍यूटर और प्रिंटर जैसी डिवाइसों को इंटरनेट और नेटवर्क से जोड सकते हैं।

वाई-फाई के नाम से जुडा तथ्‍य - Facts About Wi-Fi Technology



कहते हैं वायरलेस फिडेलिटी (Wireless fidelity) का असल में कोई मतलब नहीं है, असल में वाई-फाई एलायंस (Wi-Fi Alliance) कंपनी इस वाई-फाई ( Wi-Fi) डिवाइस को बनाती है उन्‍होनें हाई-फाई ( Hi-fi ) यानि हाई फिडेलिटी की तर्ज पर इसे वाई-फाई नाम दिया है, जिसका कोई अर्थ नहीं है। यह केवल वाई-फाई एलायंस पंजीकृत ट्रेडमार्क शब्द है। लेकिन फिर भी इसे वायरलेस फिडेलिटी (Wireless fidelity) केे नाम सेे जाना जाता है।

वाई-फाई कैसे काम करता है - How Does Wi-Fi Technology Work



वाई-फाई ( Wi-Fi) डिवाइस बिना किसी तार के दो डिवाइसों के बीच में कनेक्‍शन बनाता है, जिसके लिये यह रेडियो फ्रीक्वेंसी (Radio Frequency) का इस्‍तेमाल करता है, यह टेक्नोलॉजी IEEE 802.11 कई स्टैण्डर्ड पर बेस्ड है जिसकी आवृत्ति 2.4GHz से 5GHz के बीच होती है, वायरलेस नेटवर्क किसी भी डिवाइस को कनेक्‍ट करने के लिये एक Access Point (AP) की आवश्‍कयता होती है और जिस ऐरिया में वाई-फाई ( Wi-Fi) होता है उसे हॉट-स्पॉट (Hotspot) कहते है।



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What is Li-Fi - क्‍या है लाई-फाई

अब तक आप वायरलेस नेटवर्क ( Wireless Network ) बनाने के लिये वाई-फाई ( Wi-Fi) तकनीक का इस्‍तेमाल कर रहे थे, लेकिन टेक्नोलॉजी ( Technology ) बदलते देर नहीं लगती है, एक नई तकनीक लाई-फाई (Li-Fi) आ चुकी है, Li-Fi की स्‍पीड Wi-Fi के मुकाबले 100 गुना तेज है, आईये जानते हैं क्‍या है लाई-फाई - What is Li-Fi

क्‍या है लाई-फाई - What is Li-Fi




लाई-फाई ( Li-Fi ) का पूरा अर्थ है लाइट फिडेलिटी (light fidelity), इसका अाविष्‍कार (Invention) एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर/इंजीनियर हेराल्ड हास ( Harald Haas ) ने सन् 2011 में किया था। यह भी वाई-फाई ( Wi-Fi) की तरह ही एक वायरलैस नेटवर्किंग सुविधा है। जो Purelifi के सीईओ भी हैं।


वाई-फाई ( Wi-Fi) रेडियो फ्रीक्वेंसी (Radio Frequency) पर आधारित है, इसके विपरीत लाई-फाई ( Li-Fi ) असल में प्रकाश पर आधारित है, जो वाई-फाई से की तुलना में 100 गुना तेजी से डाटा का आदान-प्रदान करने में सक्षम है। लाई-फाई ( Li-Fi ) तकनीक में डाटा का आदान-प्रदान करने के लिये LED बल्‍ब का प्रयेाग किया जाता है यानि इस तकनीक में डेटा विजिबल लाइट कम्युनिकेशन (वीएलसी) द्वारा ट्रांसफर होता है। जिस प्रकार आपका टीवी रिमोट काम करता है कुछ-कुछ उसी तरह।


लाई-फाई तकनीक का एक बड़ा फायदा यह है कि यह वाई-फाई की तरह दूसरे रेडियो सिग्नल के लिए अवरोध नहीं बनता है. इसलिए इसका इस्तेमाल हवाई जहाज जैसी उन जगहों पर किया जा सकता है जहां रेडियो सिग्नल में अवरोध की समस्या आती है।


इसमें एक खामी भी है, चूंकि यह तकनीक प्रकाश पर आधारित है इसलिये यह फाई ( Wi-Fi)सिग्‍नल की तरह दीवार या किसी ठोस वस्‍तु के अार-पार जाने में अक्षम है।


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What is Hi Fi ( High Fidelity ) - क्‍या है ( हाई-फाई ) हाई फिडेलिटी

अब आपने वाई-फाई ( Wi-Fi ) समझा, लाई-फाई ( Li-Fi ) समझा अब बारी है इससे मिलते जुलते एक और शब्‍द की हाई-फाई (Hi Fi) , लेकिन ये वो वाला हाई-फाई नहीं है जिसे आप आमतौर पर किसी भी विशिष्‍टता बताने के लिये प्रयोग करते हैं, ये है एक नये जमाने की टेक्नोलॉजी है, जिसे आप प्रयोग काफी दिनों सेे प्रयोग कर रहे हैं, आईये तो जानते हैं क्‍या है (Hi Fi) हाई फिडेलिटी - What is Hi Fi ( High Fidelity )

क्‍या है ( हाई फाई ) हाई फिडेलिटी  टेक्नोलॉजी - What is Hi Fi Technology



असल में हाई फिडेलिटी ( High Fidelity ) शब्‍द आज ऑडियाे या साउण्‍ड से जुडा हुआ है, इस तकनीक में ऑडियाे की गुणवत्‍ता में उच्‍च स्‍तर का सुधार किया जाता है, जिससे उसे आपके सुनने लायक बनाया जा सके, लेकिन इसमें हमेशा सुधार की गुंंजाइश रहती है, यह तकनीक तक से चली आ रही हैै जब से स्‍पीकर बने हैं -


उदाहरण के लिये वर्ष 1960 में रिलीज हुई ऐतिहासिक फिल्म मुगले-ए-आजम को कलर करने के बाद उसके साण्‍उड को डिजिटल किया गया, क्‍योंकि उस मूवी में रिकार्डेट ऑडियो आज के समय के स्‍पीकर के हिसाब से ठीक नहीं था, उसमें काफी सारी खामियां थी, लेकिन उस समय के हिसाब से वही साण्‍उड ठीक था। यानि ( हाई-फाई ) हाई फिडेलिटी पर काम बहुत समय से चल रहा है।


तो आखिर क्‍या होती है ( हाई-फाई ) हाई फिडेलिटी साउण्‍ड (high fidelity sound) , इसे ऐसे कह सकते हैंं कि हम अगर आप ऑख बंंद करके स्‍पीकर से साउण्‍ड सुनें तो आपको ऐसा लगे कि आप वास्‍तविकता में उसी जगह पर हैं जिसकी आप आवाज सुन रहे हैं न कि कोई रिकॉर्डिंग।

 
इसी तकनीक का इस्‍तेमाल कर आज के दौर के स्‍पीकर ( speaker) हेडफोन ( Headphones ) और साउंड सिस्टम (Stereo Systems) बनाये जा रहे हैं, जो आपको वास्‍तविक साउंड ( Real Sound ) का अनुभव करा रहे हैं। जिससे कभी ध्‍वनि भ्रम (real sonic illusion) की स्थिति भी उत्‍पन्‍न हो जाती है।


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What Happens When We Click REFRESH Button In Computer - कंप्यूटर रिफ्रेश करने से क्‍या होता है ?

अक्‍सर लोग अपने Computer के Desktop को दे दना दन Refresh करते रहते हैं, लेकिन जब उनसे पूछा कि भई ऐसा क्‍यों कर रहे तो उन्‍होनें कहा कि दूसरे भी ऐसा करते हैं और किसी ने कहा कि Refresh करने से Computer की Speed बढती है तो क्‍या ये वाकई में सही है, आईये जानने की कोशिश करते हैं कि कंप्यूटर रिफ्रेश करने से क्‍या होता है (Computer Refresh Karane Se Kya Hota Hai) -

कंप्यूटर रिफ्रेश करने से क्‍या होता है - Computer Refresh Karane Se Kya Hota Hai



Computer को Refresh करने के लिये माउस से Right Click किया जाता है और मेन्‍यू में से Refresh को सलेक्‍ट किया जाता हैै या कीबोर्ड से Shortcut Key " F5 " का प्रयोग कर Refresh किया जाता है, बहुत से लोगों को केवल यही पता है कि Computer में Refresh करने का Option केवल Desktop पर ही होता है, लेकिन ऐसा नहीं है Refresh का Option Computer में उन सभी जगह होता है जहॉ उसकी जरूरत होती है, Desktop पर किसी Folder के अंदर यहॉ तक कि कंट्रोल पैनल (Control Panel) में भी, ऐसा क्‍यों ?





    • कंप्यूटर हार्डवेयर सीखें

    • 5 टिप्‍स सेकेंड हैंड या पुराना कंप्‍यूटर खरीदने के लिये

    • इन टिप्स से कंप्यूटर को बनाएं सुपरफास्‍ट





लेकिन 90% लोग यही करते हैं आप भी right-click – refresh’ .. ‘right-click – refresh’ जब भी खाली हों बस ‘right-click – refresh’ पर सोचा है इससे होता क्‍या है, चलिये बताते हैं -


पुराने कंप्‍यूटर (Old Computer) बहुत स्‍लो हुआ करते थे, जब उनमें कोई नया फोल्‍डर या फाइल बनायी जाती थी या कोई अन्‍य बदलाव किया जाता था तो वह इतनी जल्‍दी दिखाई नहीं देेता था, लेकिन रिफ्रेश करने से वह बदलाव तुरंंत दिखाई दे जाता था।


अगर तकनीकी भाषा में कहें तो जब प्रोसेसर (Processor) और रैम (RAM)  लंबे समय तक कार्य करने के बाद कंप्‍यूटर स्‍लो हो जाते हैं, कंप्‍यूटर को अपडेट (Update) नहीं कर पाते हैं और जब आप Refresh करते हैं तो प्रोसेसर सक्रिय हो जाता है अौर रैम फ्री हो जाती है, एक प्रकार से इससे आपको स्‍पीड बढने का एहसास होता है लेकिन असल में F5 या Refresh करने की प्रक्रिया आपके रैम और प्रोसेसर की स्थिति को up-to-date करने के लिये होती है।


आज के कंप्‍यूटर अपने आप अपडेट (Update) हो जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता है लेकिन अगर ऐसा न हो तो आप F5 या Refresh कर सकते हैं और यह ऑप्‍शन है भी इसलिये।


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What is Dictaphone - क्‍या है डिक्टाफोन

डिक्टाफोन (Dictaphone) शायद यह नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, लेकिन आपको जानकार आश्‍चर्य होगा कि यह तकनीक 1881 को हमारे बीच में आ गयी थी, डिक्टाफोन (Dictaphone) ध्वनि रिकॉर्डिंग करने वाला एक अविष्‍कार था, जिसे बनाने में अलेक्जेंडर ग्राहम बेल (Alexander Graham Bell) महत्‍वपूर्ण योगदान रहा- आईये जानते हैं क्‍या है डिक्टाफोन - What is Dictaphone

क्‍या है डिक्टाफोन - Kya Hai Dictaphone



आज आप बोले गये शब्‍दों (Speech) को Text में Converter के लिये Speech Recognition जैसे Software का इस्‍तेमाल करते हैं, जिसके लिये अापको माइक्रोफोन (Microphone) और कंप्‍यूटर (computer) का इस्‍तेमाल करना होगा, लेकिन हर जगह तो आप माइक्रोफोन (Microphone) और कंप्‍यूटर (computer) नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन डिक्‍टाफोन ( Dictaphone) एक ऐसा उपकरण है जो बोले हुए शब्दों को रिकार्ड कर सकता है और जरूरत पडने पर टाइप में या Text में Convert भी कर सकता है।


अभी हाल ही में दिल्‍ली की निचली अदालत में डिक्‍टाफोन ( Dictaphone) का प्रयोग करने पर विचार किया गया है, जिसमें डिक्‍टाफोन ( Dictaphone) स्टेनो टाइपिस्ट (Steno Taepist) की गैरमौजदूगी में भी जजों द्वारा दी गयी डिक्टेशन (dictation ) के आधार पर जजमेंट टाइप कर सकेेगा। यानि जज बिना स्टेनो टाइपिस्ट (Steno Taepist) के भी आर्डर टाइप कर सकेंगें।


"डिक्टाफोन" नाम वाई-फाई (Wi-Fi) की तरह ही एक अमेरिकी कंपनी का ट्रेडमार्क है, जो श्रुतलेख मशीन (dictation machine) बनाया करती थी, जिससे अाप किसी भी भाषण आद‍ि को रिकार्ड कर बाद में सुन सकते थे और टाइप कर सकते थे। सन् 2000 से पहले डिक्टाफोन केवल आवाज रिकार्ड कर सकता था, इनमें वॉइस रिकग्निशन सिस्टम (Voice Recognition Systems) जो रिकार्ड किये गये शब्‍दों को टाइप करने में सक्षम था। वर्तमान में "डिक्टाफोन" कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनी Nuance Communications की एक शाखा है।

आज के समय में कई कंपनियॉ वॉइस रिकग्निशन सिस्टम (Voice Recognition Systems) का प्रयोग कर रही हैं लेकिन यह सब "डिक्टाफोन" से ही प्रेरित हैं।


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क्या है ड्रोन/क्‍वाड कॉप्‍टर विमान - What is Drone/Quadcopter

अभी हाल ही में गूगल और एमेजन में ड्रोन (Drone) के माध्‍यम से सामान की होम डिलेवरी करने की तैयारी है, भारत में ड्रोन (Drone) का प्रयोग बढता जा रहा है, कहीं पुलिस अपराधियों को पडकने के लिये तो कहीं किसान अपने खेतों में कीटनाशक का छिड़काव करने के लिये ड्रोन (Drone)  का इस्‍तेमाल कर रहे हैं और कुछ जगह तो शादियों में भी वीडियोग्राफी करने के लिये ड्रोन कैमरे (Drone Camera) का इस्‍तेमाल हो रहा है, लेकिन अभी भी बहुत लोगों के ड्रोन अभी भी एक पहेली है तो आईये जानते हैं क्या है ड्रोन/क्‍वाड कॉप्‍टर विमान - Kya Hai Drone/Quadcopter

क्या है ड्रोन/क्‍वाड कॉप्‍टर विमान - Kya Hai Drone Quadcopter



ड्रोन एक आधुनिक युग का चालक रहित विमान है, इसे कहीं दूर से रिमोट या कंप्‍यूटर द्वारा ऑपरेट किया जा सकता है, एक बेसिक ड्रोन डिजायन चार विंंग यानि पंखोंवाला (चतुष्कोण) होता है, इसलिये इसे क्‍वाड कॉप्‍टर भी कहते हैं। ड्रोन शब्द अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका हिंंदी भाषा में अर्थ होता है नर मधुमक्‍खी। असल में यह नाम इसके उडने के कारण इसे मिला  यह बिलकुल एक मधुमक्‍खी की तरह ही उडता है, एक जगह पर स्थिर भी रह सकता है यानि मंडरा सकता है।

ड्रोन का प्रयोग पहली बार आस्ट्रिया ने वेनिस पर बम बरसाने के लिए किया था और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 'फ्लाइंग बम'  का काफी इस्तेमाल किया गया था असल में यह मानव रहित विमान थे जो विकसित होकर आज के दौर के ड्रोन बने हैं।

अभी भारत में ड्रोन के सटीक कानून नहीं है, लेकिन (डीजीसीए) यानि नागर विमानन महानिदेशालय अब इसके लिए गाइडलाइन तैयार कर रहा है, जिसमें भारत में ड्रोन उडाने के लिये कडे नियम बनाये जा सकते हैं, जिसमें हर ड्रोन के लिये एक अलग यूनिक आइडैंटीफिकेशन नंबर (यू.एन.आई.) नंबर होगा बिलकुल फोन के आईईएमआई नंबर की तरह।

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क्‍या होता है एनएफसी फीचर - What Is NFC Feature

एनएफसी फीचर (NFC feature) -  अगर आपने अभी हाल ही में सैमसंग स्मार्टफोन गैलेक्सी जे 3 (Samsung Galaxy J3) हो तो इसमें मोटरसाइकिल सवारों के लिए एक खास फीचर बाइक एस मोड दिया गया है और साथ में एक एस बाइक मोड का स्‍टीकर (S Bike Mode Sticker) दिया गया है, जिस पर मोबाइल टच करने से मोबाइल का एस बाइक मोड (S Bike Mode) एक्टिविट हो जाता है, असल में यह फोन एनएफसी इंटिग्रेटेड (Integrated NFC) है। आईये जानते हैं कि आखिर क्‍या है एनएफसी तकनीक (NFC technology) और यह कैसे काम करती है - क्‍या होता है एनएफसी फीचर - What Is NFC Feature

क्‍या होता है एनएफसी फीचर - Kya Hota Hai NFC Feature




एनएफसी क्या है - NFC Kya Hai ?


असल में एनएफसी ( NFC) की फुलफार्म है नियर फील्ड कम्युनिकेशन (Near Field Communication) है, यह एक High Frequency Wireless Communication Technology है, जो कम दूरी यानि ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 सेमी की दूरी से दो डिवाइसों के बीच डाटा ट्रांंसफर कर सकती है, इसकी मदद से आप केवल एक फोन का दूसरे फोन से टच करने भर से ही तेज गति से डाटा ट्रांसफर कर सकते हैं। NFC कनेक्‍शन डिवाइस का टच करने पर तुरंत जुड जाता है और काम खत्‍म होने पर अपनेआप बंद हो जाता है। NFC कनेक्‍शन ब्लूटूथ के मुकाबले 300 MBPS की गति सेे डाटा ट्रांसफर कर सकता है।


सैमसंग स्मार्टफोन गैलेक्सी जे 3 (Samsung Galaxy J3) के साथ में एस बाइक मोड का स्‍टीकर (S Bike Mode Sticker) दिया जाता है यह स्‍टीकर एक NFC Tag है, जिसमें NFC टैग एक तरह की चिप होती है, जिसमें छोटी सी इन्फोर्मेशन (Information) सेव की जा सकती हैै, बिलकुल क्‍यूआर कोड (QR Code) की तरह और जब आप इससे मोबाइल टच करते हैं जिसमें डाली गयी सूचना केे अााधार पर आपके फोन का एस बाइक मोड (S Bike Mode) एक्टिव हो जाता है।

इसके अलावा आप NFC से आप डाटा ट्रांसफर कर सकते हैं, मोबाइल वॉलेट (Mobile Wallet) का इस्‍तेमाल कर मोबाइल पेमेंट कर सकते हैं। अब तो NFC Business Card का भी प्रयोग होने लगा है, जिसमें आपकी सारी सारी डिटेल्स रहती है, जब किसी को वह डिटेल्स देनी हो तो बस अपना मोबाइल उसके मोबाइल से टच कर दिया।


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कैप्चा क्‍या है - What Is Captcha

अक्सर आप जब किसी साइट पर नई ईमेल आईडी या नया अकाउंट बनाते हैं तो एक टेढ़ी-मेढ़ी सी इमेज दिखाई देती है जिसमें कुछ नंबर या फोटो दिखाई देते हैंं इसे कैप्चा (Captcha) कहते हैं, लेकिन यह कैप्चा (Captcha) होता क्या है जो आम यूजर्स को अक्सर परेशान करता है, आखिर कैप्चा (Captcha) बनाने की क्‍या जरूरत थी, आईये जानने की कोशिश करते हैं - कैप्चा क्‍या है -  What Is Captcha

कैप्चा क्‍या है - Captcha Kya Hai



कैप्चा (Captcha) एक प्रकार का चैलेंज टेस्ट होता है कैप्चा (Captcha) की फुल फॉर्म है, (Completely Automated Public Turing Test to tell Computers and Humans Apart) जिसे केवल इंसान ही सुलझा सकता है इससे पता चलता है की अकाउंट बनाने वाला व्यक्ति इंसान ही है ना कि कंप्यूटर।


कैप्चा (Captcha) के टेढ़े-मेढ़े अक्षरों को केवल मनुष्‍य ही पढ सकता हैै और समझ सकता है, फिलहाल कैप्चा (Captcha) को पढना कंंप्‍यूटर के बस में नहीं है। कैप्चा (Captcha) का सीधा सा फार्मूला है कि कैप्चा (Captcha) हल कीजिये और साबित कीजिये कि आप कंप्‍यूटर नहीं मनुष्‍य हैं। लेकिन मनुष्‍य को खुद को साबित करने की जरूरत क्‍यों पडी ?


चलिये उदाहरण के लिये जीमेल को लेते हैं, जब आप जीमेल पर नया अकाउंट बनाते हैं तो आपकी सुविधा के लिये गूगल की तरफ से अपने सर्वर पर 15 GB का स्‍पेस फ्री दिया जाता है, अब कुछ खुरापती लोग ऐसे भी होते हैं जिन्‍हें आप स्पैमर के नाम सेे भी जानते हैं वो कुुछ ऐसे ऑटोमेटिक कंप्‍यूटर प्रोग्राम बना देते हैं जो दिन भर बिना बात जीमेल पर नया अकाउंट बनाते रहेंं, अब सोचिये अगर दिन भर में इस ऑटोमेटिक कंप्‍यूटर प्रोग्राम ने 100 नयेे अकाउंट बना दिये तो जीमेल का 1500 GB यानि 1.5 TB स्‍पेस बेकार कर दिया बस उन्‍हीं से बचने के लिये कैप्चा (Captcha) कोड को बनाया गया है

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Friday, 22 December 2017

क्या है रेफरल लिंक/कोड - What is a Referral Link/Code

अक्‍सर आपको इंंटरनेट का इस्‍तेमाल करते समय रेफरल लिंक (Referral Link) या रेफरल कोड (Referral Code) जैसे शब्‍द दिखाई देते होगें, या तो यह लिंक आपको किसी वेबसाइट पर या व्‍हाट्सएप और फेसबुक ग्रुप में आपके दोस्‍तों द्वारा शेयर किये जाते हैं तो आखिर क्‍या होता है रेफरल लिंक (Referral Link) या रेफरल कोड (Referral Code) का मतलब और इनसे क्‍या फायदा होता है आईये जानते हैं क्या होता है रेफरल लिंक/कोड - What is a Referral Link/Code -


क्या होता है रेफरल लिंक/कोड - What is a Referral Link/Code




रेफरल लिंक (Referral Link) या रेफरल कोड (Referral Code) का सीधा संबंध एफिलिएट मार्केटिंग (Affiliate marketing) से असल में कुछ बेवसाइट या एप्‍लीकेशन अपने प्रोडक्‍ट या एप्‍लीकेशन को प्रमोट करने के इंटरनेट और मोबाइल यूूजर्स का सहारा लेती हैैंं, जिसके बदले वह प्रमोट करने व्‍यक्ति को कमीशन भी देती है, जब कंपनी अपने किसी प्रोडक्‍ट को अापसे प्रमोशन कराती है तो वह आपको एक यूनिक लिंक देती हैै, असल में यह लिंक एक ट्रेकिंग लिंक (Tracking Links) होता हैै, जिससे पता चलता हैै कि आपके द्वारा किये गये प्रमोशन से कंपनी की वेबसाइट को कितने क्लिक मिलेे या अगर एप्‍लीकेशन है तो किनते बार वह एप्‍लीकेशन आपके द्वारा दिये गये लिंक से डाउनलोड हुई, इन्‍हींं लिंक्‍स को रेफरल लिंक (Referral Link) कहते हैं, इसके अलावा कुछ एप्‍लीकेशन में रेफरल कोड (Referral Code) का आप्‍शन होता है, यह कोड भी यूनिक और ट्रेकिंग कोड होता है अौर बिलकुल ट्रेकिंग लिंक (Tracking Links) की तरह ही काम करता है।

रेफरल लिंक का फायदा - Benefits Of the Referral Link


कई सारी कंपनिया रेफर और अर्न प्रोग्राम चलाती है, जिसके लिये आपको उनकी बेवसाइट या एप्‍लीकेशन पर रजिस्‍टर करना होता है वहां सेे आपको एक रेफरल लिंक (Referral Link) या रेफरल कोड (Referral Code) दिया जाता हैै, इस लिंक को आप कहीं भी शेयर कर सकते हैं, अगर आपके रेफरल लिंक (Referral Link) पर क्लिक कर या रेफरल कोड (Referral Code) का इस्‍तेमाल कर कंपनी को कोई फायदा होता है तो वह उसमें आपको भी तय कमीशन देती है, इस तरह सेे आपकी घर बैठे कमाई हो जाती है, बहुत से इंटरनेट यूजर्स इन्‍हीं से पैसा कमा रहे हैं, यह ऑनलाइन पैसे कमाने के कुछ आसान तरीकों में से एक है।


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क्‍या है इलेक्ट्रॉनिक आर्टिकल सर्विलांस - What is Electronic Article Surveillance (EAS)

EAS यानि इलेक्ट्रॉनिक आर्टिकल सर्विलांस (Electronic Article Surveillance) नये जमाने का एंटी थीफ सिस्‍टम (Anti-thief systems) है, EAS (Electronic Article Surveillance) का इस्‍तेमाल अब भारत में भी होने लगा है, आईये जानते हैं EAS (Electronic Article Surveillance) के बारे में


क्‍या है इलेक्ट्रॉनिक आर्टिकल सर्विलांस - What is Electronic Article Surveillance (EAS)


असल में ईएएस (EAS) का प्रयोग रात के चोरों के लिये नहीं बल्कि दिन के चोरों के लिये किया जा रहा है, ऐसे लोग जो दिन के समय भी लाइब्रेरी या शॉपिंग मॉल से लोगों की नजर बचाकर सामान चोरी कर लेते हैं, यह तकनीक उन्‍हीं लोगों को पकडने के लिये है। अभी हाल ही में विश्व पुस्तक मेला 2017 में भी किताब चोरों के लिए EAS यानि इलेक्ट्रॉनिक आर्टिकल सर्विलांस का तकनीक का प्रयोग किया गया हैै।

कैसे काम करती है EAS यानि इलेक्ट्रॉनिक आर्टिकल सर्विलांस


इसके तहत लाइब्रेरी या शॉपिंग मॉल हर प्रोडक्‍ट पर एक एक्टिवेटेड चिप लगाई जाती है इसे Security Tag या EAS Tag भी कहते हैं, अगर कोई व्‍यक्ति पेमेंट काउंटर पर बिना पेमेंट किये बाहर जाता है गेट पर लगे eas sensor उसे पकड लेते हैं जिससे सिक्‍योरिटी अलार्म (Security Alarm) बज उठता है और चोर पकडा जाता है, लेकिन जब आप पेमेंट काउंटर पर पेमेंट करते हैं तो EAS Tag को Tags Removal मशीन से डीएक्टिवेट कर दिया जाता है।


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एटीएम क्या है - What is ATM

एटीएम (ATM) यानि आटोमेटिड टैलर मशीन (Automated Teller Machine) वैसे तो आप एटीएम (ATM) से पूरी तरह सेे परिचित हैं क्‍यों इससे पैसे जो निकलते हैं, भारत में नोटबंदी के दौरान एटीएम (ATM) पर लगी लम्‍बी कतारें कोई नहीं भूल सकता है एटीएम (ATM) ने से ही लोगाें को राहत मिली थी, लेकिन एटीएम (ATM) के बारे में अभी भी ऐसी कई जानकारी है जो आपके लिये जानना जरूरी है - आईये जानते हैं क्या है एटीएम - What is ATM

एटीएम क्या है - What is ATM



ATM का पूरा अर्थ है ऑटोमेटेड टैलर मशीन (Automated Teller Machine) इसका हिंदी नाम स्वचालित गणक मशीन है, इसे आटोमेटिक बैंकिंग मशीन(Automatic banking machine), कैश पाइंट (Cash Point) , बैंनकोमैट (Bankomat) भी कहते हैं, आधुनिक एटीएम की सबसे पहली पीढ़ी का प्रयोग 27 जून, 1967 में लंदन के बार्केले बैंक ने किया था। इससे पहले 1960 के दशक में एटीएम (ATM) को बैंकोग्राफ नाम से जाना जाता था, माना जाता है कि लंदन में इसका सबसे पहले इस्तेमाल हुआ और इसके आविष्कार का श्रेय जॉन शेफर्ड बैरन (John Shepherd-Barron) को दिया जाता है. उनका जन्म ब्रिटिशकालीन भारत में 23 जून 1925 को मेघालयके शिलॉन्ग में हुआ था


बैरन एटीएम का पिन 6 डिजिट का करने के पक्ष में थे, लेकिन उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि 6 डिजिट ज्यादा है और लोग इसे याद नहीं रख पाएंगे। इस कारण बाद में उन्होंने चार डिजिट का एटीएम पिन बनाया। आज भी चार डिजिट का ही पिन चलन में है।


भारत में पहली बार 1987 में एटीएम की सुविधा शुरू हुई थी। भारत में पहला एटीएम हॉगकॉग एंड शंघाई बैंकिंग कॉरपोरेशन (एचएसबीसी) ने मुंबई में लगाया था। वर्तमान में एटीएम का प्रयोग दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है।

कैसे काम करता है एटीएम (ATM)


एटीएम एक तरह का डाटा टर्मिनल (Data Terminal) होता है, जिसमें मोनीटर, की-बोर्ड माउस जैसे इनपुट और आउटपुट डिवाइस होते हैं। यह होस्ट प्रोसेसर (Host Processor) से जुड़ा होता है, जो बैंक और एटीएम के बीच कड़ी का काम करते हैं। इसके लिये इंटरनेट की मदद ली जाती है। इससे यूजर के एटीएम में एटीएम कार्ड डालते ही बैंक के होस्ट प्रोसेसर से जुड़ जाता है। ऐसे में वह बिना बैंक जाए ही अपने खाते से पैसा निकाल सकता है।


  • हर ग्राहक के डेबिट या क्रेडिट कार्ड के पिछले हिस्से में एक खास Magnetic strip होती है, जिसमें उसकी पहचान संख्या व अन्य जरूरी जानकारियां कोड के रूप में होती हैं।

  • जब ग्राहक कार्ड को एटीएम के कार्ड-रीडर में डालता है, तो एटीएम मैग्नेटिक स्ट्रिप में छिपी इन जानकारियों को पढ़ लेता है।

  • यह जानकारी जब होस्ट प्रोसेसर के पास पहुंचती है, तो वह ग्राहक के बैंक से ट्रांजेक्शन का रास्ता साफ करता है।

  • जब ग्राहक कैश निकालने का विकल्प चुनता है तो होस्ट प्रोसेसर और उसके बैंक अकाउंट के बीच एक Electronic Fund Transfer प्रक्रिया होती है।

  • इस प्रक्रिया के पूरा होते ही होस्ट प्रोसेसर एटीएम को एक अप्रूवल कोड भेजता है। यह कोड एक तरह से मशीन को पैसा देने के आदेश के समान होता है।


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डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड क्या होते है - What is Credit Card And Debit Card

डेबिट कार्ड (Debit Card) और क्रेडिट कार्ड (Credit Card) आज हर कोई इस्‍तेमाल कर रहा है, अगर सामान्‍य तरीके से देखा जाये तो क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड दोनों का प्रयोग प्लास्टिक मनी के तौर पर किया जाता है लेकिन क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड दोनों में अंतर होता है, आईये जानते हैं डेबिट कार्ड (Debit Card) और क्रेडिट क्रेडिट कार्ड (Credit Card) क्या होते है - What is Credit Card And Debit Card

डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड क्या होते है - What is Credit Card And Debit Card



क्रेडिट कार्ड क्या है - What is Credit Card


क्रेडिट कार्ड (Credit Card) देखने में बिलकुल साधारण सा होता है, लेकिन यह बहुत पावरफुल होता है असल में आप क्रेडिट कार्ड (Credit Card) तब भी कर सकते हैं जब आपके अकांउट में बैलेंस शून्‍य हो, यानि क्रेडिट कार्ड (Credit Card) एक प्रकार से Postpaid SIM की तरह ही काम करता है, बस अंतर इतना है कि एक ऋण है जिसे आप क‍भी भी उपयोग में ला सकते हैं और आसान मासिक किस्तों में उस रकम को चुका सकते हैं, क्रेडिट कार्ड (Credit Card) से खर्च की गई रकम पर ब्याज लगता है, बिलकुल जिस प्रकार आप बैंक से लोन लेते हैंं अंतर बस इतना है कि यहां आपको बिना किसी कागजी कार्यवाही के क्रेडिट कार्ड (Credit Card) के माध्‍यम से लोन दिया जाता है


डेबिट कार्ड क्या है - What is Debit Card


डेबिट कार्ड (Debit Card) बैंक द्वारा ग्राहक को एटीएम (ATM) से पैसे निकलने के लिए दिया जाता है, जब आप कहीं भी भुगतान करने के लिये डेबिट कार्ड (Debit Card) का इस्‍तेमाल करते हैं तो सीधे आपके बैंक खाते से इस धनराशि की कटौती की जाती है, यानि डेबिट कार्ड (Debit Card) का पूरी तरह से प्रीपेड है, अगर आपके बैंक खाते हैं पैसे नहीं है तो आप डेबिट कार्ड (Debit Card) इस्‍तेमाल नहीं कर सकते हैंं



डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड में अंतर - Difference Between Debit Card And Credit Card



  • जब आप डेबिट कार्ड (Debit Card) से कोई भी शॉपिंग या खरीदारी या एटीमए से नकद निकालते हैं तो रकम आप खाते से सीधे रकम काट ली जाती है, लेकिन जब आप क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का इस्‍तेमाल करते हैं तो आपके किये गये हर लेन-देन का बिल जाता है।

  • डेबिट कार्ड (Debit Card) लेने के लिये आपके पास एक बैंक खाते का होना आवश्‍यक है।

  • क्रेडिट कार्ड (Credit Card) लेने के लिये आपके पास बैंक खाते का होना आवश्‍यक नहीं है।

  • डेबिट कार्ड (Debit Card)  में अभी ख़रीदो, अभी भुगतान करो का विकल्प होता है

  • क्रेडिट कार्ड (Credit Card) में अभी खरीदो, बाद में भुगतान करो का विकल्प रहता है



क्‍या क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का इस्‍तेमाल एटीएम मशीन पर किया जा सकता है ? Can We Use Credit Card in ATM Machine ?


जी हां आप क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का इस्‍तेमाल ATM Machine पर कर सकते हैं और cash withdraw कर सकते हैंं, लेकिन हर बार क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का इस्‍तेमाल ATM Machine करने पर Transaction Fee ली जाती है।


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क्‍या होता है कंप्‍यूटर में अवतार - What Is Avatar in Computer

जब से James Cameron की अवतार मूवी (Avatar Movie) आयी है तब लोगों में अवतार (Avatar) को लेकर जिज्ञासा बढ गयी है, वैसे तो हिंदू धर्म में जब भगवान धरती पर अवतरित होते हैं या जन्‍म लेते हैं तो उसे अवतार कहते हैं लेकिन कंप्‍यूटर की दुनिया में अवतार (Avatar) अर्थ अलग ही होता है, तो क्‍या आप जानना नहीं चाहते हैं कि computing में क्‍या होता है अवतार (Avatar) -

क्‍या होता है कंप्‍यूटर में अवतार - What Is Avatar in Computer




कंप्‍यूटर Avatar आपका ग्राफिकल प्रतिरूप होता है, असल में जब आप गेम खेलते हैं या किसी चैटग्रुप में चैट करते हैं तो यह Avatar आपको री प्रेजेंट करता है, यह और भी कारगर तब होता है जब आप ऑनलाइन  मल्‍टीप्‍लेयर गेम खेल रहे होते हैं, जिसमें 2 या उससे अधिक प्‍लेयर होते हैं तब आपका अवतार ही आपको री प्रेजेंट करता है, चूंकि आप तो गेम में नहीं जा सकते हैं


Avatar एक आयकन भी हो सकता है या कोई 2D या 3D Realistic Character भी हो सकता है अगर अवतार मूवी की बात करें तो वहां भी कुछ कुछ ऐसा ही किया गया है, लेकिन वास्‍तविक दुनिया में आप अपना ऐसा अवतार नहीं बना सकते हैं जो आपकी तरह सोचता हो और या आपको दूसरे ग्रह पर ले जा सकता हो,  खैैर चलिये वास्‍त‍ि‍विक दुनिया की बात करते हैं, यहां Role Playing Video Games में अवतार का इस्‍तेमाल होता है


सबसे पहले कंप्‍यूटर की दुनिया में अवतार शब्‍द का इस्‍तेमाल 1979 में हुआ था, उस समय एक Role Playing Video Game आया था जिसका नाम था Avatar, इसे University of Illinois PLATO system ने बनाया था


अवतार आपके Gaming Experience को कई गुना बढा देते हैं, अगर आपको याद हो 8bit Games के समय में भी Avatar हुआ करते थे, अगर आपने Strike Games खेले हों तो उनमें आपके प्‍लेयर का Avatar दिया गया होता है, अगर आप गेम में आपके अवतार के घायल होने का मतलब है कि आप हार रहे हैं,


आज तक बहुत से लोग अपनी फेसबुक या अन्‍य सोशल नेटवर्किंग साइट के लिये अपने फोटो के बजाय अपने Avatar का इस्‍तेमाल करते हैं, इसके अलावा Artificial intelligence के लिये भी Avatar का इस्‍तेमाल किया जाता है


ऐसी कई वेबसाइट हैं जहां आप अपना Avatar बना सकते हैं -



  • doppelme.com

  • avatarmaker.com

  • Pickaface.net

  • avatarmaker.net


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Thursday, 21 December 2017

क्‍या है सीजीआई और वीएफएक्‍स What is CGI and VFX

अगर आपने मूूवी बाहुबली-द बिगनिंग और बाहुबली द कॉन्क्लूज़न देखी हो तो आपको पूरी मूवी में आश्यर्चजनक सीन हर दो तीन मिनट में दिखाई देेते रहे होगें, इसलिये यह मूवी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भव्य फिल्म कही जा रही है और इसकी भव्‍यता की वजह है इसके विश्‍ााल और भव्‍य सेट जिसमें माहिष्मती का महल, आकाश छूता झरना या कालकेय केे साथ्‍ा युद्ध जिसमें वीएफएक्स और सीजीआई का प्रयोग किया गया गया है, आईये जानते हैं क्‍या होते हैं वीएफएक्स और सीजीआई स्पेशल इफेक्ट्स-

सीजीआई (CGI)


सीजीआई (CGI) का पूरा अर्थ है (कंप्यूटर ग्राफिक्स इमेज) इस तकनीक का प्रयोग आज कल की सभी फिल्‍मों में हो रहा है, वजह सीधी सी है  सीजीआई (CGI) के प्रयोग से किसी भी प्रकार का सेट तैयार कर सकते हैं, जो देखने में बिलकुल असली जैसा होता है, इसे फिल्‍म में इस तरह से प्रयोग किया जाता है कि आप असली नकली में अंतर नहीं कर सकते हैं साथ ही आपका सेट बनाने का हजारों लाखों का खर्चा बच जाता है, अगर आपने अवतार मूवी देखी हो तो पूरी की पूरी मूवी में कंप्यूटर ग्राफिक्स इमेज का प्रयोग किया गया है


सीजीआई (CGI) से क्‍या क्‍या कर सकते हैं


सीजीआई (CGI) से आप बडें बडें विशाल सेट बना सकते हैं, अतंरिक्ष जीव बना सकते हैं, डायनासोर बना सकते हैं, परमाणु विस्‍फोट बना सकते हैं और आपकी कल्‍पना शक्ति पर निर्भर करता है

वीएफएक्स (VFX)


कई बार फिल्मों के दृश्य देखकर हमारी सांसें थम जाती हैं। हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि कैसे शूट किया गया होगा, लेकिन यह कमाल है VFX तकनीक का वीएफएक्स (VFX) असल मेें होता है विजुअल इफेक्ट्स (Visual Effects) यह ऐसी तकनीक होती है जहां सीजीआई (CGI) से तैयार दृश्यों को वास्‍तविक दृश्यों से इस प्रकार जोडा जाता है कि दोनों में कोई अंतर दिखाई न दे, इसके इसके लिये ग्रीन या ब्‍लू स्‍क्रीन का प्रयोग किया जाता है, अब तो वीएफएक्स श्रेणी में ऑस्कर भी दिये जाते हैं लाइफ ऑफ पाई’ याद है ना जिसमें एक लडका नाव में एक शेर के साथ रहता है


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क्‍या है वानाक्राई रैंसमवेयर वायरस - What is Wanna Cry 'ransomware' Virus

12 मई 2017 को दुनियाभर में कप्‍यूटरों पर एक वायरस का हमला हुआ है, जिससे भारत भी अछूता नहीं है इस वायरस का नाम है "वानाक्राई" यह एक रैंसमवेयर वायरस है, तो आईये जानते हैं क्‍या है 'वानाक्राई' रैंसमवेयर वायरस - What is Wanna Cry Ransomware Virus -

क्‍या है वानाक्राई रैंसमवेयर वायरस - What is Wanna Cry Ransomware Virus


सबसे पहले जानते हैं रैंसमवेयर "Ransomware" क्‍या होता है, इसका अर्थ है फिरौती मॉगने वाले कंप्‍यूटर प्रोग्राम, जिनके प्रभाव से आपके कंप्‍यूटर काम करना बंद कर देता है और कंप्‍यूटर को मुक्‍त करने के बदले फिरौती की रकम मॉगी जाती है और असल जिंदगी की तरह ही इसकी कोई गारंटी नहीं है कि फिरौती की रकम मिलने के बाद भी आपका कंप्‍यूटर वायरस से मुक्‍त हो जायेगा


इसी प्रकार का एक रैंसमवेयर "Ransomware" वायरस वानाक्राई (Wanna Cry) का विश्‍व भर के लगभग 100 देशों में के कंप्यूटरों पर Attack हुआ है इसे Ransomware Virus Attack कहा जा रहा है इस वायरस का अटैक जिन कंप्‍यूटरों पर हुआ है उन कंप्यूटर ने काम करना बंद कर दिया है, यह दुनिया सबसे बड़ा साइबर हमला बताया जा रहा है


जब Ransomware Virus Attack आपके Computer पर होता है तो आपकेे Computer की सभी फाइलें लॉक हो जाती है अगर तकनीकी भाषा में कहें तो encrypt हो जाती है इनक्रिप्ट का अर्थ है यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें data या information को secret codes में convert कर दिया है और उसे जब तक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है जबकि उसे de encrypt न किया जाये


चलिये समझते हैं आपके कंप्‍यूटर में पुराने गानों का कलेक्‍शन, आपकी शादी का वीडीयो आपके गेम्‍स आपके एमएस वर्ड में बनाई गयी जरूरी फाइलें, पावर पाइंट में बनाये गये जरूरी स्‍लाइड शो और पीडीएफ ईबुक सभी एक ऐसी फाइल में बदल जायेगें जिन्‍हें किसी भी software में खोला नहीं जा सकता है, जब तक कि इस Ransomware Virus को रिमूव न कर दिया जाये


इस वायरस के मामले में भी ऐसा ही है जो कंप्यूटर्स हैक हुए हैं उन्हें खोलने पर एक मैसेज दिखाई दे रहा है जिसमें कहा गया है कि यदि फाइल वापस पाना चाहते हो तो पैसे चुकाने होंगे, यानि फाइलों को encrypt किया गया है और de encrypt करने के लिये पैसे की मॉग की जा रही है यानि फिरौती मॉगी जा रही है

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क्लाउड कम्प्यूटिंग और उसके प्रकार (Types Of Cloud Computing)

Cloud Computing के बारे में हम आये दिन News और Internet पर पढते रहते हैं, Cloud Computing एक बहुत ही Useful Technology है, आईये जानते हैं क्‍या है क्लाउड कम्प्यूटिंग (Cloud Computing) और यह कितने प्रकार की होती है - क्लाउड कम्प्यूटिंग और उसके प्रकार (Types Of Cloud Computing)

क्लाउड कम्प्यूटिंग और उसके प्रकार Types Of Cloud Computing


इससे आप अपनी सभी जरूरी files को जैसे Documents, photos, music, videos etc. को Computer के साथ साथ Internet पर भी Save करके रख सकते हो, जैसे बादल कहीं से पानी लेते हैं और कहीं पे भी बरसा देते हैं उसी आधार पर है Cloud Computing यह भी नेेेटवर्क के माध्‍यम से काम करती है, आईये जानते हैं यह कैसे काम करती है


Cloud Computing के लिये बडी बडी कंंपनियों जैसे Google या microsoft बहुत ही विशाल डाटा सेेंटर (Data center) बनाती है डाटा सेेंटर (Data center) वह जगह होती है जहां एक बहुत बडें पैमाने पर डाटा (जैसे आपके वीडीयो, फोटो या डाक्‍यूमेंट) काे स्‍टोर किया जाता है यह आपस में एक नेटवर्क से जुडे रहते हैं और कहीं भी जरूरत पडने पर इंटरनेट के माध्‍यम से वहां तुरंत डाटा का पहुंचा दिया जाता है, उदाहरण के लिये फेसबुक डाटा सेंटर (Facebook Data Center) को ले लीजिये यह भी क्‍लाउड से जुडा है आपके द्वारा फेसबुक अपलोड किये जाने वाले फोटो और वीडीयो यहीं सुुुुरक्षित रहते हैैं और आप इस डाटा का उपयोग फेसबुक की एप्‍लीकेशन या वेबसाइट के जरिये दुनियां में किसी भी स्‍थान पर कर सकते हैं बस आपको चाहिये फेसबुक की एप्‍लीकेशन और यूजर आईडी पासवर्ड


लेकिन छोटी कंपनीया जिनके पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपना खुद का डाटा सेंटर बना सकें तो वह क्‍लाउड के माध्‍यम से इंटरनेट पर हार्डवेयर और स्‍पेस किराये पर ले सकते हैं, उदाहरण के लिये अगर अाप जीमेल पर अपनी ईमेल आईडी बनाते हैं तो आपको गूगल की तरफ से 15GB का क्‍लाउड स्‍टोरेज फ्री दिया जाता है, लेकिन अगर आपको 15GB से ज्‍यादा की आवश्‍यकता है तो आप इसे गूगल क्‍लाउड से किराये पर ले सकते हैं Google Drive पर एक ईमेल आईडी पर 30 TB तक का स्‍पेस किराये के लिये उपलब्‍ध है 30 TB का मासिक किराया है 19500 रू0 महीना, आप पूरी लिस्‍ट यहां से चैक कर सकते हैं

Cloud Computing का अर्थ सिर्फ डाटा अपलोड करना ही नहीं है, गूगल ने Google Drive के माध्‍यम से Cloud पर कई सारी एप्‍लीकेशन भी उपलब्‍ध करा रखीं हैं जिन्‍हेें आप बिना अपने कंम्‍यूटर में इस्‍टॉल किये सीधे अपने ब्राउजर में चला सकते हैं ये एप्‍लीकेशन हैं - Google Docs, Google Sheets, Google Slides, Google Forms, google drawings और google sites, इसके अलावा अगर आपके कंप्‍यूटर में फोटोशॉप नहीं चल रहा है तो आप Cloud Computing की सहायता से उसे भी चला सकते हैं, लेकिन Cloud Computing के लिये आपके पास एक अच्‍छा इंटरनेट कनेक्‍शन होना जरूरी है

अब बात करते हैैं Cloud Computing कितने प्रकार की हाेती है - अभी वर्तमान में Cloud Computing चार प्रकार की है -

  1. प्राइवेट क्लाउड कंप्यूटिंग(Private Cloud Computing) - प्राइवेट क्‍लाउड का उदाहरण है Google Drive जहां आपके सारे डाक्‍यूमेंट आपके ईमेल आईडी और पासवर्ड से सुरक्षित रहते हैं, इन्‍हें आपके अलावा और कोई उपयोग नहीं कर सकता है यह कुछ हद तक ज्यादा सुरक्षित माना जाता है

  2. पब्लिक क्लाउड कंप्यूटिंग (Public Cloud Computing) - पब्लिक क्लाउड हर सामान्‍य व्‍यक्ति के लिये उपलब्‍ध रहता है, उदाहरण के लिये अगर किसी साइट पर कोई ईबुक फ्री डाउनलोड के लिये उपलब्‍ध करायी गयी हो और आप उसे एक ही क्लिक में बिना अकांउट बनाये डाउनलोड कर पाते हों पब्लिक क्लाउड थोड़ा कम सुरक्षित माना जाता है

  3. कम्युनिटी क्लाउड कंप्यूटिंग (Community Cloud Computing) -कम्युनिटी क्लाउड कंप्यूटिंग केवल एक ग्रुप के सदस्‍यों के लिये उपलब्‍ध्‍ा रहती है, इसके अलावा और कोई बाहरी व्‍यक्ति इस डाटा का इस्‍तेमाल नहीं कर सकता है, उदाहरण के लिये किसी कंपनी के कर्मचारी ही केवल उस कंपनी के साइट पर उपलब्‍ध डाटा का इस्‍तेमाल कर सकते हैं या किसी स्‍कूूूल द्वारा बनायी गयी वेबसाइट और उस पर उपलब्‍ध सामग्री का उपयोग केवल उस स्‍कूल या संस्‍था के छाञ ही कर सकते हैं

  4. हाइब्रिड क्लाउड कंप्यूटिंग (Hybrid Cloud Computing) - हाइब्रिड क्लाउड में पब्लिक क्लाउड और प्राइवेट क्लाउड दोनों का इस्‍तेमाल किया जाता है, ऐसे  किसी साइट पर कुछ सामग्री सार्वजनिक उपलब्‍ध हो और कुछ सामग्री केवल रजिस्‍टर्ड यूजर्स के लिये ही उपलब्‍ध हो ऐसे क्‍लाउड को हाइब्रिड क्लाउड कहते हैं


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डार्क इंटरनेट क्‍या है - What is Dark Internet

ब्‍लू व्‍हेल गेम आने के बाद आपने डार्क इंटरनेट (Dark Internet ), डीप वेब (Deep web) और डार्क वेब (Dark web) जैसे शब्‍द सुने होगें और जानने की जिज्ञासा भी रही होगी कि आखिर क्‍या है ये डार्क इंटरनेट (Dark Internet ), डीप वेब (Deep web) और डार्क वेब (Dark web) क्‍या है तो आईये जानने की कोशिश करते हैं कि डार्क इंटरनेट क्‍या है - What is Dark Internet

डार्क इंटरनेट क्‍या है - What is Dark Internet


अगर इंटरनेट (Internet ) की बात की जाये तो आप तुरंत ही बतायेंगे कि आप इंटरनेट को अच्‍छे से जानते हैं, आप गूगल, फेसबुक, यूट्यूूब और इसके अलावा लाखों ऐसी वेबसाइट हैं जिन्‍हें अाप और आपके साथ दुनिया भर के लोग हर रोज इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन अगर हम कहें दुनिया भर के लोग इंटरनेट का जो हिस्‍सा इस्‍तेमाल करते हैं वह केवल पूरे इंटरनेट का केवल 5 प्रतिशत ही है तो शायद कई लोग यकीन नहीं मानेगें लेकिन ये सच है आप साधारण ताैर इंटरनेट को जो हिस्‍सा इस्‍तेमाल करते हैं या सीधे शब्‍दों में कहें तो आप इंटरनेट के जिस हिस्‍से तक पहुॅच रखते हैं वह Public Internet है इसेे Surface web भी कहते हैैं वह केवल 5 प्रतिशत ही है, अब प्रश्‍न है कि बाकी 95% इंटरनेट कौन प्रयोग करता है और वह कहां हैं तो आईये जानने की कोशिश करते हैं

इंटरनेट को access कर पाने के अनुसार उसे तीन भागों में बॉटा गया है -



  1. सर्फेस वेब (Surface Web)

  2. डीप वेब (Deep Web)

  3. डार्क वेब (Dark Web)


क्‍या है सर्फेस वेब (Surface Web)



सर्फेस वेब (Surface Web) इंटरनेट का वह भाग है जिसे आप आमतौर पर इस्‍तेमाल करते हैं इसके लिये आपको किसी special permission की अावश्‍यकता नहीं हाेती है, इन वेेबपेज पर पहुॅचने के लिये आप search engine का सहारा लेते हैं इस दूसरे तरीके से देखें तो सर्फेस वेब (Surface Web) को Google और Bing जैसे search engine इंडेक्स करते हैं और आपके द्वारा कोई भी क्‍वेरी सर्च करने पर Result के तौर पर दर्शाते हैं और ज्‍यादातर लोग इन्‍हीं सर्च इंजन का प्रयोग कर सर्फेस वेब (Surface Web) की इन वेबसाइट पर पहुॅचते हैैं, लेकिन उन पेज का क्‍या जो Google और Bing जैसे Search Engine इंडेक्स नहीं करते हैं वही होता है डीप वेब (Deep Web) और डार्क वेब (Dark Web) चलिये समझने की काेशिश करते हैं

क्‍या है डीप वेब (Deep Web)


क्‍या आप किसी के बैंक खाते की जानकारी को इंटरनेट पर सर्च करते हैं या आप किसी वेेेबसाइट का एडिमिन पैनल देख्‍ा सकते है, क्‍या ईमेल को गूगल पर सर्च किया जा सकता है या फिर ब्‍लॉगर या वर्डप्रेस की ड्राफ्ट पोस्‍ट को इंटरनेट पर सर्च किया जा सकता है ? तो इसका सीधा जबाब होगा नहीं, इसके लिये आपको उस पेज के एडमिन की परमीशन की आवश्‍यता होगी साथ ही आपको Access करने के लिए password का पता होना भी जरूरी है तभी आप उस जानकारी को Access कर पायेगें यानि डीप वेब (Deep Web) के अन्‍तर्गत internet के वे सभी Web Pages आते हैं, जिन्‍हे Search Engine में सर्च नहीं कर पाते हैं लेकिन ये लीगल होते हैं, डीप वेब (Deep Web) को Invisible Web के नाम से भी जाना जाता है, इसमें अन्‍तर्गत जो पेज आते हैं वह हैं ब्लॉग प्लेटफार्म, ड्राफ्ट पेज, साइंटिफिक रिसर्च, एकेडमिक और कॉर्पोरेट डाटाबेस, गवर्नमेंट पब्लिकेशन्स, इलेक्ट्रॉनिक बुक्स, ईमेल, डिरेक्टरी आदि



क्‍या है डार्क वेब (Dark Web)


कुछ सालाें पहले डीप वेब (Deep Web) अाैर डार्क वेब (Dark Web) काे एक ही माना जाता था लेकिन गैर कानूनी गतिविधियों वजह से इसे दो हिस्‍सों डीप वेब (Deep Web) अाैर डार्क वेब (Dark Web) में विभाजित कर दिया गया डार्क वेब (Dark Web) डीप वेब (Deep Web) का ही हिस्‍सा है, इसका प्रयोग इंटरनेट पर सभी प्रकार के गैर कानूनी काम करने के लिये किया जाता है जैसे ड्रग्स खरीदना व बेचना, किसी भी तरह का ख़तरनाक से ख़तरनाक हथियार खरीदना व बेचना, मानव तस्करी, ATM Debit/Credit Card की जानकारी चुराकर किसी को बेचना आदि, डार्क वेब (Dark Web) पेज पर आम तरीकों से नहीं पहुॅचा जा सकता है, यहां पहुुॅुचने के लिये लोग एक अलग ब्राउजर का इस्‍तेमाल करते हैं, जिसे टॉर कहते हैं, TOR एन्क्रिप्शन टूल से डार्क वेब (Dark Web) पेज को एनक्रिप्ट किया जाता है ये साइट छुप जाती है, सर्च इंंजन इसे इंडेक्स नहीं पाते और यह सिर्फ टॉर ब्राउजर पर ही दिखती हैं


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क्या है टॉर ब्राउजर - What is Tor browser in Hindi

हमने ब्‍लू व्‍हेल गेम और डार्क वेब (Dark Web) की जानकारी में टॉर (TOR) के बारे में उल्‍लेख किया था, इसमें हमने बताया था कि कैसे लोग डार्क वेब (Dark Web) में अपनी पहचान छुपाने के लिये टॉर (TOR) का इस्‍तेमाल करते हैं तो आईये जानते हैं आखिर क्या है टॉर - What is TOR in Hindi

क्या है टॉर ब्राउजर - What is Tor browser in Hindi


क्‍या है टॉर - What is TOR


टॉर (TOR) द ऑनियन रूटर इंटरनेट का एक प्रकार है, इसमें एक खास किस्म फ़ायरफॉक्स ब्राउज़र की सहायता से इंटरनेट पर बिना ट्रैक हुए अनॉनिमस (अपनी पहचान छिपाकर) ब्राउज़ किया जाता है, टॉर (TOR) को अमरीकी नेवी रिसर्च लैब ने बनाया था

इंटरनेट पर आपकी पहचान क्‍या होती है ?


असल में जब आप अपने फोन या कम्‍प्‍यूटर को इंटरनेट से जोडते हैं तो आपके डिवाइस को इंटरनेट पर पहचाने के लिये एक खास कोड दिया जाता है, जिससे आपकी लोकेशन और नेटवर्क का पता चलता है। इस कोड को आईपी एड्रेस (IP address) या इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस (Internet Protocol Address) कहते हैं।


टॉर क्‍या काम करता है


किसी साइट को खोलने पर जो डिजिटल चिह्न, जिन्‍हें आप कुकी कहते हैं उन्हें समझ पाना इतना कठिन बना देता है, यानि यह उन्‍हें इन्स्क्रिप्ट कर देता है जिससे उन्‍हें इंटरनेट पर ट्रैक नहीं किया जा सकता है और टॉप पर खुलने वाली साइट .COM के बजाय .Onion में ओपन होती है .Onion टॉप लेबल डोनेम का एक प्रकार है जिसका प्रयोग Anonymous Hidden Service देने के किया जाता है, इस प्रकार की वेबसाइट केवल टॉर ब्राउजर पर ही ओपन होती हैं कोई सर्च इंजन जैसे गूगल और बिंंग इन्‍हें इंडेक्स नहीं कर पाता है और Tor browser के नेटवर्क से connect होने के बाद ही आपकी असली पहचान आईपी एड्रेस (IP address) को छुपता है


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Wednesday, 20 December 2017

Who owns the INTERNET ? इंटरनेट का मालिक कौन ?

अगर आप अपने फोन में आज INTERNET इस्‍तेमाल कर रहे होगें तो आप मन में कभी ना कभी यह सवाल तो आया होगा कि INTERNET का मालिक कौन है, लेकिन बहुत से INTERNET यूजर अपने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) को ही इंटरनेट का मालिक समझते हैं जैसे वह अगर जियाे को इंटरनेट इस्‍तेमाल कर रहे हैं तो उनके लिये रिलायंस जिओ ही इंटरनेट का मालिक है लेकिन ऐसा नहीं हैं इस पोस्‍ट में हम जानने की कोशिश करेंगे कि कौन है इंटरनेट का मालिक Who owns the INTERNET ?

इंटरनेट का मालिक कौन ? Who owns the INTERNET ?




इंटरनेट कब शुरू हुुुुआ ?




1969 में अमेरिका के रक्षा विभाग में एडवांस रिसर्च प्रोजेक्‍ट एजेंसी (ए0आर0पी0ए0) नाम का नेटवर्क लांच किया गया, जो युद्ध के समय एक दूसरे को गोपनीय सूचना भेजने के प्रयोग में लाया गया। 1972 में रेटॉमलिसंन ने पहला ईमेल संदेश भेजा और जैसे जैसे ईमेल के जरिये सूचना भेजने के फायदों का पता चलता गया इसका प्रयोग भी बढता गया और इस तरह यह नेटवर्क लोकप्रिय हो गया।

इंटरनेट क्‍या है ?


इंटरनेट एक प्रकार का नेटवर्क है जो दो या दो से अधिक कंप्‍यूटरों को एक दूसरे से कनेक्‍ट करता है, जिसकी सहायता से आप कोई भी सूचना एक कंप्‍यूटर से दूसरे कंप्‍यूटर तक कुछ ही सेकेण्‍ड में पहुॅचा सकते हैं, इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर क्लाइंट और सर्वरों का इस्तेमाल कर दुनिया भर में एक दूसरे को Data Tranfer करते है। आज केवल भारत में ही 1 करोड से ज्‍यादा व्‍‍यक्ति इन्‍टरनेट से प्रयोग करते हैं।



इंटरनेट आप तक कैसे पहुॅचता है ?


पूरी दुनिया में तेज गति से इंटरनेट पहुॅचाने के लिये फाइबर ऑप्टिक केबल का इस्‍तेमाल किया जाता है, जो समुद्र के नीचे बिछाई जाती है, इन्‍हीं फाइबर ऑप्टिक केबल की सहायता से पूरी दुनिया में इंंटरनेट पहुॅचाया जाता है

फाइबर ऑप्टिक केबल ही क्‍यों ?


फाइबर ऑप्टिक केबल की डेटा ट्रान्सफर स्पीड भी बाकी केबल्स से अधिक होती है, उसका कारण्‍ा है कि फाइबर ऑप्टिक केबल को छोडकर और सभी केबल में डाटा का संचार इलेक्ट्रिक करंट के रूप में किया जाता है लेकिन फाइबर ऑप्टिक केबल में डाटा ट्रांसमिशन् इलेक्ट्रिक करंट के रूप में नहीं बल्कि प्रकाश के रूप में किया जाता है और फाइबर ऑप्टिक केबल के कारण ही 1 सेकेण्‍ड से कम समय में आप Google.com ओपन कर पाते हैं जबकि उसका सर्वर अमेरिका में है आपको जानकार आश्‍चर्य होगा कि इंटरनेट के लिये समुद्र में 8 लाख किलोमीटर से ज्‍यादा लम्‍बाई के फाइबर ऑप्टिक केबल बिछाये गये हैं

इंटरनेट आप तक कौन पहुॅॅॅचाता है ?


जैसा कि हमने बताया है फाइबर ऑप्टिक केबल द्वारा आप तक इंटरनेट पहुॅचाया जाता है लेकिन आप तो जीयो, आयडिया या एयरटेल का इंंटरनेट इस्‍तेमाल करते हैं या कुुुछ लोग अपने शहर से लोकल इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) से इंटरनेट कनेक्‍शन लेते हैं, चलिये समझते हैं, इन तीनों लोगों की वजह से ही इंटरनेट आप तक पहुॅचा तो इसी आधार पर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है -


  • TEAR 1 - वह इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) हैं जिन्‍होंने समुद्र में फाइबर ऑप्टिक केबल बिछाये हैं, इन्‍हें Tier 1 networks के नाम से जाना जाता है, इसमें भारत की कंम्‍पनी Tata Communications भी शामिल है

  • TEAR 2 - वह इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) हैं जो Tier 1 Networks से इंटरनेट सेवा लेते हैं और आप तक पहुॅचाते हैं, जैसे जियो, आयडिया, वोडाफोन आदि

  • TEAR 3 - ये वो इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) है तो TEAR 2 से इंटरनेट सेवा लेते हैं और अपने लोकल ऐरिया में सर्विस देते हैं इनके पास लिमिडेट कनैक्‍शन देने का अधिकार होता है जैसे Tikona


क्‍या इंटरनेट फ्री है ?


जी हॉ इंटरनेट बिलकुल फ्री है, लेकिन जो अापसे चार्ज लिया जाता है वह आप तक उसको लाने में जो खर्चा होता है उसका लिया जाता है अगर इंटरनेट का चार्ज होता है तो आपको Google.com खोलने के अलग पैसे देने होते और mybigguide.com देखने के अलग तो भगवान शुक्र है इंटरनेट फ्री है



कौन है इंटरनेट का मालिक Who owns the INTERNET ?


तो इन सवाल का जबाब साफ है इंटरनेट पर किसी का अधिकार नहीं है यानि इंटरनेट का मालिक कोई नहीं सब एक दूसरे के सहयोग से आप तक इंटरनेट सेवा पहुॅचाते हैं, इसीमें सबका फायदा है

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नेटवर्क टोपोलॉजी क्या है - What is Network Topology in Hindi

टोपोलॉजी (Topology)- नेटवर्क (Network) कंप्यूटर, सर्वर, मेनफ्रेम, नेटवर्क डिवाइस या अन्‍‍‍य ऐसी डिवाइस जो एक दूसरे से डाटा शेयर करती है उनका आपस का कनेक्‍शन चाहे वह वायरलैस हो या केबल द्वारा नेटवर्क (Network) कहलाता है और यह नेटवर्क (Network) किस तरह का है यानि इसकी आकृति, ले-आउट या संरचना किस प्रकार की है इसे टोपोलॉजी (Topology) और ये दोनोंं शब्‍‍‍द मिलकर ही बनते हैं नेटवर्क टोपोलॉजी (Network topology) तो आईये जानते हैैं नेटवर्क टोपोलॉजी क्या है - What is Network Topology in Hindi

नेटवर्क टोपोलॉजी क्या है - What is Network Topology in Hindi




नेटवर्क टोपोलॉजी (Network topology) 4 प्रकार की होती है:-



  • रिंग नेटवर्क टोपोलॉजी (Ring Network Topology)

  • बस नेटवर्क टोपोलॉजी (Bus Network Topology)

  • स्टार नेटवर्क टोपोलॉजी (Star Network Topology)

  • मेश नेटवर्क टोपोलॉजी (Mesh Network Topology)


रिंग नेटवर्क टोपोलॉजी (Ring Network Topology)



  

रिंग नेटवर्क टोपोलॉजी (Ring Network Topology) में सभी कंप्‍यूटर एक गोलाकार आकृति में अपने अधीनस्थ (Subordinate) कम्प्यूटर से जुड़े होते हैंं, इसमें कोई होस्ट (Host) या कंट्रोलिंग कम्प्यूटर (Controlling Computer) नही होता है, इसमें कोई भी कंप्‍यूटर किसी दूसरे कंप्‍यूटर पर निर्भर नहीं होता है, रिंग नेटवर्क (Ring Network) में साधारण गति से डाटा का आदान-प्रदान होता है

बस नेटवर्क टोपोलॉजी (Bus Network Topology)




बस नेटवर्क टोपोलॉजी (Bus Network Topology) मेंं एक ही केेेबल सेे सभी कंम्‍यूटरों को एक ही क्रम में जोडा जाता है, जोडने के लिये टर्मिनेटर (Terminator) का इस्‍तेमाल किया जाता है, इस नेटवर्क को इंस्‍टॉल करना सरल होता है, लेकिन किसी एक कंप्‍यूटर में खराबी होने पर पूरा नेटवर्क काम करना बंद कर देता है

स्टार नेटवर्क टोपोलॉजी (Star Network Topology)





स्टार नेटवर्क टोपोलॉजी (Star Network Topology) मेंं एक हब से ही सारे कंप्‍यूूटरों को जोडा जाता है, इस नेटवर्क में एक होस्ट कम्प्यूटर होता है, जिससेे बाकी सभी कंप्‍यूटरों कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन अगर हब में कोई खराबी आती है तो सारा नेटवर्क बेकार हो जाता है, लेकिन अगर कोई लोकल कम्प्यूटर ख़राब होता है तो शेष नेटवर्क इससे प्रभावित नही होता है

मेश नेटवर्क टोपोलॉजी (Mesh Network Topology)





मेश नेटवर्क टोपोलॉजी (Mesh Network Topology) में सारे कंप्यूटर कही न कही एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और एक दूसरे से जुड़े होने के कारण ये अपनी सूचनाओ का आदान प्रदान आसानी से कर सकते हैं, इसमें कोई होस्ट कंप्यूटर नहीं होता है, अगर किसी भी कंप्यूटर मेश कोई खराबी आती है तो भी यह नेटवर्क काम करता रहता है टोपोलॉजी को मेश नेटवर्क (Mesh Network) या मेश भी कहा जाता है
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Major Technological Inventions And Inventors - प्रमुख तकनीकी आविष्कार और आविष्कारक

आप तो जानते है कि "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है" लेकिन इन आविष्कार को करने के लिये आविष्कारक भी होने चाहिये, अगर ये आविष्कारक (...